Hindi Kahaniya - Kids Stories, Timepaas Stories

Heero Ka Heera

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आज सवेरे ही से गुलाबदेई काम में लगी हुई है। उसने अपने मिट्टी के घर के आँगन को गोबर से लीपा है, उस पर पीसे हुए चावल से मंडन माँडे हैं। घर की देहली पर उसी चावल के आटे से लीकें खैंची हैं और उन पर अक्षत और बिल्‍वपत्र रक्‍खे हैं। दूब की नौ डालियाँ चुन कर उनने लाल डोरा बाँध कर उसकी कुलदेवी बनाई है और हर एक पत्ते के दूने में चावल भर कर उसे अंदर के घर में, भींत के सहारे एक लकड़ी के देहरे में रक्‍खा है। कल पड़ोसी से माँग कर गुलाबी रंग लाई थी उससे रंगी हुई चादर बिचारी को आज नसीब हुई है। लठिया टेकती हुई बुढ़ि‍या माता की आँखें यदि तीन वर्ष की कंगाली और पुत्र वियोग से और डेढ़ वर्ष की बीमारी की दुखिया के कुछ आँखें और उनमें ज्‍योति बाकी रही हो तो - दरवाजे पर लगी हुई हैं। तीन… Continue Reading

Guru Mata Ka Ashirwad

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पश्चिम के लिए निकलने से पहले स्वामी विवेकानंद अपनी गुरुमाता (स्वामी रामकृष्ण परमहंस की पत्नी) शारदा देवी का आशीर्वाद लेने गए। विवेकानंद पहली बार संवामी रामकृष्ण का संदेश लेकर अमेरिका जा रहे थे। विवेकानंद जब पहुंचे, उस समय गुरुमाता रसोई-घर में खाना बना रही थीं। विवेकानंद ने गुरुमाता के चरण स्पर्श कर कहा, "मैं अपने गुरु का संदेश पूरी दुनिया तक पहुंचाने के लिए अमेरिका जाना चाहता हूँ। मुझे आशीर्वाद दीजिए।" गुरु-माता ने बात अनसुनी करते हुए, पास पड़े एक चाकू की ओर संकेत कर कहा, "नरेन, वह चाकू मुझे देना।" विवेकानंद ने उन्हें चाकू पकड़ाया तो माँ शारदा प्रसन्नता के भाव से आशीर्वाद देते हुए बोलीं, "तुम सहर्ष जाओ, मैं तुम्हें आशीर्वाद देती हूँ। जाओ परदेश में देश का नाम रोशन करो। अपने माता-पिता व गुरु को गौरवान्वित करों। जगत का कल्याण करो। " गुरुमाता का आशीर्वाद पाकर विवेकानंद ने एक प्रश्न पूछने की आज्ञा मांगी व पूछा, "आपने… Continue Reading

Prayshchit

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दफ्तर में ज़रा देर से आना अफ़सरों की शान है। जितना ही बड़ा अधिकारी होता है, उतनी ही देर में आता है; और उतने ही सबेरे जाता भी है। चपरासी की हाज़री चौबीसों घंटे की। वह छुट्टी पर भी नहीं जा सकता। अपना एवज देना पड़ता हे। खैर, जब बरेली जिला-बोर्ड़ के हेड क्लर्क बाबू मदारीलाल ग्यारह बजे दफ्तर आये, तब मानो दफ्तर नींद से जाग उठा। चपरासी ने दौड़ कर पैरगाड़ी ली, अरदली ने दौड़कर कमरे की चिक उठा दी और जमादार ने डाक की किश्त मेज पर ला कर रख दी। मदारीलाल ने पहला ही सरकारी लिफाफा खोला था कि उनका रंग फक हो गया। वे कई मिनट तक आश्चर्यान्वित हालत में खड़े रहे, मानो सारी ज्ञानेन्द्रियॉँ शिथिल हो गयी हों। उन पर बड़े-बड़े आघात हो चुके थे; पर इतने बहदवास वे कभी न हुए थे। बात यह थी कि बोर्ड़ के सेक्रेटरी की जो जगह एक महीने… Continue Reading

Balak

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बचपन से ही भय किसे कहते हैं नरेन्द्र नहीं जानते थे। जब उनकी आयु केवल छह वर्ष थी एक दिन वे अपने मित्रों के साथ 'चड़क' का मेला देखने गये। नरेन्द्र मेले में से मिट्टी की महादेव की मूर्तियां खरीद कर लौट रहे थे कि उनके दल का एक बालक अलग होकर फुटपाथ के से रास्ते पर जा पहुँचा। उसी समय सामने से एक गाड़ी अती देख वह बालक बुरी तरह घबरा गया। आसपास के देखने वाले भी दुर्घटना की आशंका से चीख उठे। नरेन्द्र ने जब देखा कि घोड़ागाड़ी उस बालक की ओर तेजी से आ रही है तो बिना विलम्ब किए मूर्तियों को एक ओर फेंक नरेन्द्र उस बालक को घोड़ागाड़ी के नीचे से बाहर खींच लाए। इसमें संदेह नहीं की क्षणभर के विलंब से बच्चे की जान जा सकती थी जिसे समय रहते नरेन्द्र ने बचा लिया था। छोटे-से निर्भीक बालक की सूझबूझ व बहादुरी को देख… Continue Reading

Abhushan

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आभूषणों की निंदा करना हमारा उद्देश्य नहीं है। हम असहयोग का उत्पीड़न सह सकते हैं पर ललनाओं के निर्दय, घातक वाक्बाणों को नहीं ओढ़ सकते। तो भी इतना अवश्य कहेंगे कि इस तृष्णा की पूर्ति के लिए जितना त्याग किया जाता है उसका सदुपयोग करने से महान पद प्राप्त हो सकता है। यद्यपि हमने किसी रूप-हीना महिला को आभूषणों की सजावट से रूपवती होते नहीं देखा तथापि हम यह भी मान लेते हैं कि रूप के लिए आभूषणों की उतनी ही जरूरत है जितनी घर के लिए दीपक की। किन्तु शारीरिक शोभा के लिए हम तन को कितना मलिन चित्त को कितना अशांत और आत्मा को कितना कलुषित बना लेते हैं इसका हमें कदाचित् ज्ञान ही नहीं होता। इस दीपक की ज्योति में आँखें धुँधली हो जाती हैं। यह चमक-दमक कितनी ईर्ष्या कितने द्वेष कितनी प्रतिस्पर्धा कितनी दुश्चिंता और कितनी दुराशा का कारण है इसकी केवल कल्पना से ही रोंगटे… Continue Reading

Saut

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जब रजिया के दो-तीन बच्चे होकर मर गये और उम्र ढल चली, तो रामू का प्रेम उससे कुछ कम होने लगा और दूसरे व्याह की धुन सवार हुई। आये दिन रजिया से बकझक होने लगी। रामू एक-न-एक बहाना खोजकर रजिया पर बिगड़ता और उसे मारता। और अन्त को वह नई स्त्री ले ही आया। इसका नाम था दासी। चम्पई रंग था, बड़ी-बडी आंखें, जवानी की उम्र। पीली, कुंशागी रजिया भला इस नवयौवना के सामने क्या जांचती! फिर भी वह जाते हुए स्वामित्व को, जितने दिन हो सके अपने अधिकार में रखना चाहती थी। तिगरते हुए छप्पर को थूनियों से सम्हालने की चेष्टा कर रही थी। इस घर को उसने मर-मरकर बनाया है। उसे सहज ही में नहीं छोड़ सकती। वह इतनी बेसमझ नहीं है कि घर छोड़कर ची जाय और दासी राज करे। एक दिन रजिया ने रामू से कहा-मेरे पास साड़ी नहीं है, जाकर ला दो। रामु उसके एक… Continue Reading

Rani Sarandha

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अँधेरी रात के सन्नाटे में धसान नदी चट्टानों से टकराती हुई ऐसी सुहावनी मालूम होती थी जैसे घुमुर-घुमुर करती हुई चक्कियाँ। नदी के दाहिने तट पर एक टीला है। उस पर एक पुराना दुर्ग बना हुआ है जिसको जंगली वृक्षों ने घेर रखा है। टीले के पूर्व की ओर छोटा-सा गाँव है। यह गढ़ी और गाँव दोनों एक बुंदेला सरकार के कीर्ति-चिह्न हैं। शताब्दियाँ व्यतीत हो गयीं बुंदेलखंड में कितने ही राज्यों का उदय और अस्त हुआ मुसलमान आये और बुंदेला राजा उठे और गिरे-कोई गाँव कोई इलाका ऐसा न था जो इन दुरवस्थाओं से पीड़ित न हो मगर इस दुर्ग पर किसी शत्रु की विजय-पताका न लहरायी और इस गाँव में किसी विद्रोह का भी पदार्पण न हुआ। यह उसका सौभाग्य था। अनिरुद्धसिंह वीर राजपूत था। वह जमाना ही ऐसा था जब मनुष्यमात्र को अपने बाहुबल और पराक्रम ही का भरोसा था। एक ओर मुसलमान सेनाएँ पैर जमाये खड़ी… Continue Reading

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