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आज का हुक्मनामा – 26 दसंबर 2022


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सलोक ॥ संत उधरण दइआलं आसरं गोपाल कीरतनह ॥ निरमलं संत संगेण ओट नानक परमेसुरह ॥१॥ चंदन चंदु न सरद रुति मूलि न मिटई घांम ॥ सीतलु थीवै नानका जपंदड़ो हरि नामु ॥२॥ पउड़ी ॥ चरन कमल की ओट उधरे सगल जन ॥ सुणि परतापु गोविंद निरभउ भए मन ॥ तोटि न आवै मूलि संचिआ नामु धन ॥ संत जना सिउ संगु पाईऐ वडै पुन ॥ आठ पहर हरि धिआइ हरि जसु नित सुन ॥१७॥ अर्थ: जो संत जन गोपाल प्रभू के कीर्तन को अपने जीवन का सहारा बना लेते हैं, दयाल प्रभू उन संतों को (माया की तपस से) बचा लेता है, उन संतों की संगति करने से पवित्र हो जाते हैं। हे नानक! (तू भी ऐसे गुरमुखों की संगति में रह के) परमेश्वर का पल्ला पकड़।1। चाहे चंदन (का लेप किया) हो चाहे चंद्रमा (की चाँदनी) हो, और चाहे ठंडी ऋतु हो – इनसे मन की तपस बिल्कुल भी समाप्त नहीं हो सकती। हे नानक! प्रभू का नाम सिमरने से ही मनुष्य (का मन) शांत होता है।2। प्रभू के सुंदर चरणों का आसरा ले के सारे जीव (दुनिया की तपस से) बच जाते हैं। गोबिंद की महिमा सुन के (बँदगी वालों के) मन निडर हो जाते हैं। वे प्रभू का नाम-धन इकट्ठा करते हैं और उस धन में कभी घाटा नहीं पड़ता। ऐसे गुरमुखों की संगति बड़े भाग्यों से मिलती है, ये संत जन आठों पहर प्रभू को सिमरते हैं और सदा प्रभू का यश सुनते हैं।17।





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आज का हुक्मनामा – 25 दसंबर 2022


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वडहंसु महला ४ ॥ हरि किरपा हरि किरपा करि सतिगुरु मेलि सुखदाता राम ॥ हम पूछह हम पूछह सतिगुर पासि हरि बाता राम ॥ सतिगुर पासि हरि बात पूछह जिनि नामु पदारथु पाइआ ॥ पाइ लगह नित करह बिनंती गुरि सतिगुरि पंथु बताइआ ॥ सोई भगतु दुखु सुखु समतु करि जाणै हरि हरि नामि हरि राता ॥ हरि किरपा हरि किरपा करि गुरु सतिगुरु मेलि सुखदाता ॥१॥ सुणि गुरमुखि सुणि गुरमुखि नामि सभि बिनसे हंउमै पापा राम ॥ जपि हरि हरि जपि हरि हरि नामु लथिअड़े जगि तापा राम ॥ हरि हरि नामु जिनी आराधिआ तिन के दुख पाप निवारे ॥सतिगुरि गिआन खड़गु हथि दीना जमकंकर मारि बिदारे ॥ हरि प्रभि क्रिपा धारी सुखदाते दुख लाथे पाप संतापा ॥ सुणि गुरमुखि सुणि गुरमुखि नामु सभि बिनसे हंउमै पापा ॥२॥ हे हरि, कृपा कर! हे हरि, कृपा कर! कृपा कर! मुझे आत्मिक आनंद देने वाला गुरु मिला, मैं गुरु से परमात्मा की सिफ्त सलाह की बातें पूछा करूंगा। उस गुरु से मैं परमात्मा की सिफ्त सलाह की बातें पूछा करूंगा, जिसने परमात्मा का अमूल्य नाम रतन हासिल किया हुआ है। जिस गुरु ने जीवन का सही रास्ता बताया है मैं उस गुरु के सदा चरण लगूंगा और उस गुरु के आगे विनती करूंगा। वह (गुरू) ही (असली) भगत है, गुरु दुख और सुख को एक जैसा करके जानता है, गुरु सदा परमात्मा के नाम रंग में रंगा रहता है। हे हरि, कृपा कर! हे हरि, मेहर कर! मुझे आत्मिक आनंद देने वाला गुरु मिला दे।१। जो गुरु की शरण आकर गुरमत सुनता है, उसके (परमात्मा के) नाम के द्वारा हाउमे आदि सारे पाप नाश हो जाते हैं। हरी नाम जप के, हरी नाम जप के जगत में जितने भी दुख कलेश हैं वह सारे खत्म हो जाते हैं। जिन्होंने परमात्मा का नाम सुमिरन किया है उनके सारे दुख पाप दूर हो Continue Reading…





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आज का हुक्मनामा – 24 दसंबर 2022


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सूही महला १ घरु ६ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ उजलु कैहा चिलकणा घोटिम कालड़ी मसु ॥ धोतिआ जूठि न उतरै जे सउ धोवा तिसु ॥१॥ सजण सेई नालि मै चलदिआ नालि चलंन्हि ॥ जिथै लेखा मंगीऐ तिथै खड़े दिसंनि ॥१॥ रहाउ ॥ कोठे मंडप माड़ीआ पासहु चितवीआहा ॥ ढठीआ कमि न आवन्ही विचहु सखणीआहा ॥२॥ बगा बगे कपड़े तीरथ मंझि वसंन्हि ॥ घुटि घुटि जीआ खावणे बगे ना कहीअन्हि ॥३॥ सिमल रुखु सरीरु मै मैजन देखि भुलंन्हि ॥ से फल कमि न आवन्ही ते गुण मै तनि हंन्हि ॥४॥ अंधुलै भारु उठाइआ डूगर वाट बहुतु ॥ अखी लोड़ी ना लहा हउ चड़ि लंघा कितु ॥५॥ चाकरीआ चंगिआईआ अवर सिआणप कितु ॥ नानक नामु समालि तूं बधा छुटहि जितु ॥६॥१॥३॥ अर्थ: राग सूही, घर ६ में गुरू नानक​ देव जी की बाणी अकाल पुरख एक है और सतिगुरू की कृपा द्वारा मिलता है। मैंने​ काँसे (का) साफ और चमकीला (बर्तन) घसाया (तो उस में से) थोड़ी थोड़ी काली सियाही (लग गई)। अगर मैं सौ वारी भी उस काँसे के बर्तन को धोवा (साफ करू) तो भी (बाहरों) धोने से उस की (अंदरली) जूठ (कालिख) दूर नहीं होती ॥१॥ मेरे असल मित्र वही हैं जो (सदा) मेरे साथ रहन, और (यहाँ से) चलते समय भी मेरे साथ ही चलें, (आगे) जहाँ (किए कर्मो का) हिसाब माँगा जाता है वहाँ बेझिझक हो कर हिसाब दे सकें (भावार्थ, हिसाब देने में कामयाब हो सकें) ॥१॥ रहाउ ॥ जो घर मन्दिर महल चारों तरफ से तो चित्रे हुए हों, पर अंदर से खाली हों, (वह ढह जाते हैं और) ढहे हुए किसी काम नहीं आते ॥२॥ बगुलों के सफेद पंख होते हैं, वसते भी वह तीर्थों पर ही हैं। पर जीवों को (गला) घोट घोट के खा जाने वाले (अंदर से) साफ सुथरे नहीं कहे जाते ॥३॥ (जैसे) सिंबल का वृक्ष (है उसी प्रकार) मेरा Continue Reading…





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आज का हुक्मनामा – 23 दसंबर 2022


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सलोक ॥ संत उधरण दइआलं आसरं गोपाल कीरतनह ॥ निरमलं संत संगेण ओट नानक परमेसुरह ॥१॥ चंदन चंदु न सरद रुति मूलि न मिटई घांम ॥ सीतलु थीवै नानका जपंदड़ो हरि नामु ॥२॥ पउड़ी ॥ चरन कमल की ओट उधरे सगल जन ॥ सुणि परतापु गोविंद निरभउ भए मन ॥ तोटि न आवै मूलि संचिआ नामु धन ॥ संत जना सिउ संगु पाईऐ वडै पुन ॥ आठ पहर हरि धिआइ हरि जसु नित सुन ॥१७॥ अर्थ: जो संत जन गोपाल प्रभू के कीर्तन को अपने जीवन का सहारा बना लेते हैं, दयाल प्रभू उन संतों को (माया की तपस से) बचा लेता है, उन संतों की संगति करने से पवित्र हो जाते हैं। हे नानक! (तू भी ऐसे गुरमुखों की संगति में रह के) परमेश्वर का पल्ला पकड़।1। चाहे चंदन (का लेप किया) हो चाहे चंद्रमा (की चाँदनी) हो, और चाहे ठंडी ऋतु हो – इनसे मन की तपस बिल्कुल भी समाप्त नहीं हो सकती। हे नानक! प्रभू का नाम सिमरने से ही मनुष्य (का मन) शांत होता है।2। प्रभू के सुंदर चरणों का आसरा ले के सारे जीव (दुनिया की तपस से) बच जाते हैं। गोबिंद की महिमा सुन के (बँदगी वालों के) मन निडर हो जाते हैं। वे प्रभू का नाम-धन इकट्ठा करते हैं और उस धन में कभी घाटा नहीं पड़ता। ऐसे गुरमुखों की संगति बड़े भाग्यों से मिलती है, ये संत जन आठों पहर प्रभू को सिमरते हैं और सदा प्रभू का यश सुनते हैं।17।





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आज का हुक्मनामा – 21 दसंबर 2022


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सलोक मः ३ ॥ माणसु भरिआ आणिआ माणसु भरिआ आइ ॥ जितु पीतै मति दूरि होइ बरलु पवै विचि आइ ॥ आपणा पराइआ न पछाणई खसमहु धके खाइ ॥ जितु पीतै खसमु विसरै दरगह मिलै सजाइ ॥ झूठा मदु मूलि न पीचई जे का पारि वसाइ ॥ नानक नदरी सचु मदु पाईऐ सतिगुरु मिलै जिसु आइ ॥ सदा साहिब कै रंगि रहै महली पावै थाउ ॥१॥ मनुख शराब से भरा हुवा बर्तन लता है जिस में से कोई और आ कर पियाला भर लेता है । पर (शराब) जिस के पीने से अकल दूर हो जाती है और बोलने का जोश आ जाता है, अपने पराये की पहचान नहीं रहती, मालिक की तरफ से ढके पड़ते है, जिस के पीने से खसम (भगवान) विसरदा है और दरगाह में सजा मिलती है, ऐसी गलत शराब, जहा तक हो सके नहीं पीनी चाहिए । गुरू नानक जी कहते हैं, हे नानक ! प्रभु की मेहर नजर से नाम रूप नशा ( उस मनुख को ) मिलता है, जिस को गुरु आ के मिल जाये । ऐसा मनुख सदा मालिक के (नाम दे) रंग में रंगा रहता है और दरगाह में उस को जगह मिलती है ॥੧॥





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आज का हुक्मनामा – 22 दसंबर 2022


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सलोकु मः १ ॥ जे करि सूतकु मंनीऐ सभ तै सूतकु होइ ॥ गोहे अतै लकड़ी अंदरि कीड़ा होइ ॥ जेते दाणे अंन के जीआ बाझु न कोइ ॥ पहिला पाणी जीउ है जितु हरिआ सभु कोइ ॥ सूतकु किउ करि रखीऐ सूतकु पवै रसोइ ॥ नानक सूतकु एव न उतरै गिआनु उतारे धोइ ॥१॥ अगर सूतक को मान लें (भाव, अगर मान लें की सूतक का भ्रम रखना चाहिये, तो यह भी याद रखो की इस तरह) सूतक सब जगह होता है, गोभर और लकड़ी के अंदर भी जीव होते हैं, (भाव पैदा होते रहते हैं); अन्न के जितने भी दाने हैं, इन मैं से कोई भी दाना बिना जीव के नहीं है। पानी खुद भी एक जीव है, क्योंकि इस से हरेक जीव हरा (भाव, जीवन वाला) होता है। सूतक कैसे रखा जा सकता है? (भाव, सूतक का भ्रम पूरे तौर पर मानना बहुत ही कठिन है, क्योंकि इस प्रकार तरह तो हर समय) रसोई में सूतक पड़ा रहता है। गुरू नानक जी कहते हैं, हे नानक! इस प्रकार (भाव, भ्रम में पड़ने से) सूतक (मन से) नहीं उतरता, इस को (प्रभु का) ज्ञान ही धो कर उत्तार सकता है॥१॥





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आज का हुक्मनामा – 20 दसंबर 2022


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रामकली महला १ ॥ सुरति सबदु साखी मेरी सिंङी बाजै लोकु सुणे ॥ पतु झोली मंगण कै ताई भीखिआ नामु पड़े ॥१॥बाबा गोरखु जागै ॥ गोरखु सो जिनि गोइ उठाली करते बार न लागै ॥१॥ रहाउ॥पाणी प्राण पवणि बंधि राखे चंदु सूरजु मुखि दीए ॥ मरण जीवण कउ धरती दीनी एते गुण विसरे ॥२॥सिध साधिक अरु जोगी जंगम पीर पुरस बहुतेरे ॥ जे तिन मिला त कीरति आखा ता मनु सेव करे ॥३॥कागदु लूणु रहै घ्रित संगे पाणी कमलु रहै ॥ ऐसे भगत मिलहि जन नानक तिन जमु किआ करै ॥४॥४॥ अर्थ: (जो प्रभु सारे) जगत को सुनता है (भाव, सारे जगत की सदाअ सुनता है) उसके चरणों में तवज्जो जोड़नी मेरी सदाअ है, उसको अपने अंदर साक्षात देखना (उसके दर पर) मेरी सिंगी बज रही है। (उसके दर से भिक्षा) मांगने के लिए अपने आप को योग्य पात्र बनाना, (ये) मैंने (कंधे पर) झोली डाली हुई है, ता कि मुझे नाम-भिक्षा मिल जाए।1।हे जोगी! (मैं भी गोरख का चेला हूँ, पर मेरा) गोरख (सदा जीता-) जागता है। (मेरा) गोरख वह है जिसने सृष्टि पैदा की है, और पैदा करते हुए समय नहीं लगता।1। रहाउ।(जिस परमात्मा ने) पानी-पवन (आदि तत्वों) में (जीवों के) प्राण टिका के रख दिए हैं, सूर्य और चंद्रमा मुखी दीए बनाए हैं, बसने के लिए (जीवों को) धरती दी है (जीवों ने उसको भुला के उसके) इतने उपकार बिसार दिए हैं।2।जगत में अनेक जंगम-जोगी पीर जोग-साधना में सिद्ध हुए जोगी और अन्य साधन करने वाले देखने में आते हैं, पर मैं तो यदि उन्हें मिलूँगा तो (उनसे मिलके) परमात्मा की महिमा ही करूँगा (मेरा जीवन-उद्देश्य यही है) मेरा मन प्रभु का नाम जपना ही करेगा।3।जैसे नमक घी में पड़ा गलता नहीं, जैसे कागज़ घी में रखा गलता नहीं, जैसे कमल फूल पानी में रहने से कुम्हलाता नहीं, इसी तरह, हे दास नानक! भक्त जन परमात्मा के Continue Reading…





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