Ek Haseen Mulaqat

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दुनिया में वैसे तो हसीन बहुत कुछ हैं। इन्ही हसीन चीज़ों में एक हसीन चीज़ है किसी अजनबी व्यक्ति से एक ऐसी हसीन मुलाक़ात, जो आप कभी नहीं भूल पाते। यूं तो मुलाक़ाते काफ़ी हसीन होती हैं, और किसी ऐसे शक्स से आपकी मुलाक़ात हो जाए, जिनके साथ गुज़ारे हुये चंद लम्हों में आप कई बरसों का आनंद ले लेते हैं, तो वह काफ़ी सुकून भरा होता है, मगर कुछ स्तिथियां ऐसी हो जाती हैं जहां हम अपने पसंदीदा लोगों के साथ ज़्यादा वक़्त नहीं गुज़ार पाते या यूं कह लिजिए कि किस्मत की वजह से साथ नहीं रह पाते। यह सब इसलिये होता है क्योकिं हमारी मंज़िले अलग-अलग होती हैं और शायद रास्तें भी अलग ही होते हैं।

यह बात तब की है जब मैं बिहार के एक ज़िले मुज़फ़्फ़रपुर से भोपाल तक की यात्रा कर रहा था। मैं तो बचपन से ही भोपाल का रहने वाला हूं पर मेरे मम्मी-पापा बिहार में ही पले-बढ़े हैं और मेरे पूर्वजों का घर भी बिहार में ही है। मैं अपने मम्मी पापा और छोटे भाई के साथ भोपाल जा रहा था। हम जब स्टेशन पहुंचे तो देखा कि स्टेशन पर काफ़ी भीड़-भाड़ थी, जो हमेशा की ही तरह थी, फिर हमने ट्रेन का इन्तज़ार किया, क्योंकि ट्रेन थोड़ी देरी से चल रही थी। फिर थोड़े समय बाद ट्रेन आ गई और हमने सीटों का पता लगाया और जाकर बैठ गए।

मैं जैसे ही अपनी सीट पर जाकर बैठा, तभी हमारे कम्पार्टमेंट में एक परिवार आकर बैठा, जिसमे थी एक आंटी, एक भाईसाहब और मानो करीब मेरे ही उम्र की एक खूबसूरत लड़की। मेरी जैसे ही उससे नज़रे मिली, मैं उसे देखता ही रहा। पहली ही नज़र में मानो उसकी नज़रों ने मुझ पर कोई जादू कर दिया। उसकी बड़ी-बड़ी झील सी आंखें, चेहरे पर लटकती ज़ुल्फें, मासूमियत भरा चेहरा, बेहद प्यारी मुस्कान, इन्हें देखकर कोई भी इसे किसी परी से कम नहीं समझता। काफ़ी समय तक मेरी नज़रे उसी पर टिकी थीं, कई दफ़ा तो ऐसा भी हुआ कि उसकी और मेरी आंखें चार हुईं, जब दो-तीन दफ़ा हमारी नज़रें एक-दुसरे से टकरा गयीं, तब चौथी बार उसने अपनी नज़रें नीची कर ली और कहीं-न-कहीं वह ये समझ गयी थी कि कुछ तो हो रहा है। अगर उसकी जगह कोई दूसरी लड़की होती तो शायद ही कभी मुझसे बात करती, पर शायद वो दूसरों से अलग थी। उसकी एक खूबी ये भी थी कि वो सबसे खुल कर बात करती थी और उसकी दूसरों से खुलकर बात करने की अदा उसे और खूबसूरत बनाती थी और यह ख़ुशमिज़ाजी कहीं-न-कहीं मेरा दिल जीत रही थी।

धीरे-धीरे जैसे सफ़र आगे बढ़ा, हमारे दरमियां थोड़ी बहुत गुफ्तगू शुरु हुई। गुफ्तगू शुरु यहां से हुई कि “आप कहां जा रहे हैं?” और “कब पहुंचेंगे?” वगैरह-वगैरह। सफ़र में अक्सर यूं ही बातचीत की शुरुआत होती हैं। कुछ ही समय बाद हम एक-दूसरे के घुल-मिल गए। उसका मुझसे खुलकर बात करना मुझे अब बहुत अच्छा लगने लगा था। वैसे तो ट्रेन यात्राएं कुछ छोटी और कुछ लम्बी होती हैं, वैसे ही हमारा सफ़र भी था तो छोटा पर यादें कई थीं। वो नाज़नीन, अपनी अम्मी और बड़े भाई-जान के साथ मेरठ जा रही थी पर यहीं बातों से आगे बढ़ते हुए, उसने बातों-ही-बातों में, अपने बारे में काफ़ी कुछ बता दिया था जैसे कि वो मुज़्ज़फफ़रपुर से है और मेरठ में परिवार के साथ रहती है।

मुझे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था की इतने कम समय में वो मेरे लिये इतनी खास हो जायेगी। मैं चाहता था कि उसके साथ और वक़्त गुज़रे पर वह वक़्त है जल्दी-जल्दी बीत गया। कहने को तो उनतीस घंटे लगते हैं, मुज़फ़्फ़रपुर से भोपाल तक जाने के लिए मगर ये वक़्त कैसे इतनी जल्दी कट गया पता ही नहीं चला। मुज़फ़्फ़रपुर से भोपाल, आप दूसरी ट्रेन बदल कर ही जा सकते है, जो कि हमें झांसी जंक्शन से बदलनी थी। हम दोनों का सफ़र भी बस मुज़फ़्फ़रपुर से झांसी तक का ही था। ऐसे में हम दोनों के पास सिर्फ तेईस घंटे थे जिनमें से तीन घंटे यूं ही जान-पहचान और माहौल में ढलने में ही निकल...

गए थे, तो बचे हुए बस बीस घंटे ही थे हमारे पास।

हमारे परिवार के लोग आपस में बातचीत कर रहे थे और मैं और वो आपस में, क्योकिं हम दोनों की सीटे उनसे अलग थी , वो जो खिड़कियों के नज़दीक आमने सामने दो अलग सीटे जुड़ी हुई होती हैं ना और बीच से कम्पार्टमेंट में आने-जाने का रास्ता होता है वही। उसके साथ गुज़ारे हर पल-हर लम्हा, एक सदी जैसे थे। उस हसीन से पहली मुलाक़ात ही गज़ब की थी पर अब मिलना होगा या नहीं, यह शायद ही कोई जानता था। अब तो उसका नाम, उसका चेहरा ही याद है, और यह कि वो एक बेहद खूबसूरत और हसीन दिल मोहतरमा है जो किसी को भी पसन्द आ जाए।

हम दोनों ने कई पलों को साथ जिया था, वो दिन मैं कभी नहीं भुल पाऊंगा। जैसे कि वो ट्रेन की खिड़की वाली सीट पर आमने-सामने बैठकर, तिरछी निगाह से एक-दूसरे को देखते हुए, मुस्कुराते थे हम, कभी पहाड़ो को देखते, कभी नदियों को बहते देखते, कभी बारिश की बूंदो के साथ खेले थे हम, उस सावन के मौसम में वो गरम समोसे, गरमा-गरम चाय पी थी साथ में, शाम ढलती देखी, रात में जागे भी थे साथ-साथ, एक आदत सी हो गई थी इन चंद लम्हों में उसके साथ। हम दोनों के परिवार के लोग भी काफ़ी घुलमिल गए थे, तो और खुशी महसूस हो रही थी, पूरे कम्पार्टमेंट में मिलनसार माहौल था। सब अच्छा लग रहा था, सब खुशनुमां सा था।

इतनी खुशी उस दिन से पहले किसी से मिलने पर नहीं हुई थी। वो पहली लड़की थी जिससे मिलने पर मैं इतना खुश हुआ था। हमे कहीं-न-कहीं यह अन्दाज़ा था कि इस सफ़र के बाद शायद हम कभी नहीं मिल पायेंगे, पर हम एक दूसरे में इतना खो गए थे कि इस ख्याल को हमने अपने ज़हन में घल करने नहीं दिया। वो दिन उससे साथ बिता कर मैंने ट्रेन के एक ही सफ़र में ज़िन्दगी सी जी ली थी। काश! हम दुबारा से मिल जाएं यही दुआ है।

पूरी रात और पूरा दिन उसके साथ ही गुज़रा, बातों-ही-बातों में कब नींद लग गई पता ही नहीं चला। अगली सुबह जब नींद खुली तो अच्छा महसूस हो रहा था। उसे देखने का मन हुआ तो इधर-उधर देखने लगा पर वो दिखी नहीं, मैं बेचैन सा हो गया फिर मैनें देखा कि मेरी शर्ट की जेब में एक कागज़ का टुकड़ा था। वह कागज़ का टुकड़ा एक खत था जो उसके नाम का था, जो कि बेहद खूबसूरत नाम था “नज़्म”। खत पर जैसे ही नज़रें गई वैसे ही मेरी नज़रें, उसे ही यहां-वहां तलाशने लगीं। फिर मैने बेचैन नज़रों से खत पढ़ा।

उसने लिखा था कि ” देखो! हमारा मिलना फिर से हो पाएगा या नहीं, ये तो पता नहीं, मगर अब ऐसा लग रहा है कि तुम्हारे साथ ही मैं अपनी पूरी ज़िन्दगी जीना चाहती हूँ। वैसे तो मैं इस सफ़र में एक तन्हां राही के तौर पर ही आई थी पर मुझे नहीं पता था कि यहां मेरी ज़िंदगी के सबसे खास शक्स से मुलाक़ात हो जायेगी। इन लम्हों को मैं कभी नहीं भुला पाऊंगी। तुम्हारी ही तरह मुझे भी पता नहीं चला कि यह सफ़र कैसे इतनी जल्दी खत्म हो गया। ऐसे ही तुम्हारी ही तरह मुझे भी तुमसे जुदा होते हुए, बहुत अजीब सा लग रहा है, और माफ़ करना बिना बताए जाना पड़ रहा है और ठीक तुम्हारी तरह मैं भी रब से यही दुआ करूँगी कि हमदोनों फिर कहीं मिल जाए और क्यूंकि मैं किस्मत में बहुत मानती हूं तो मैं तुम्हारी और मेरी किस्मत आज़माती हूं। मिलना हमदोनों ही चाहते हैं इसमें दो राय नहीं है पर अगर किस्मत में मिलना होगा तुमसे तो हां ज़रूर मिलेंगे। मैं जानना चाहती हूं कि हमारी मुलाक़ात में कितनी ताक़त थी और क्या यह किसी बड़ी चीज़ में तब्दील हो सकती है या नहीं। अगर हम कहीं मिले तो मुझे उस लम्हे की बेइंतहां चाह रहेगी और बस तब तक तुम अपना ध्यान रखना और यूं ही खुश रहना।
-तुम्हारी खास दोस्त,
“नज़्म”

Submitted By:- Vikas Sahni

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Comments

6 Responses

  1. Vikas Sahni

    Shadab Mirza S❤M Tysm bhai😄

  2. Vikas Sahni

    @Soni Chauhan Aapka bohat bohat Shukriya…Itna chahne ke liye💮

  3. SHADAB MIRZA S♥️M

    Very nice bhai 😍

  4. soni chauhan

    bhaut he achi or khubsurat nd romantic story hai ,I wish aap dono eek ho jay or life time tak u he pyar karta raha god bless both of u, god plese in dono ko eek bar mila da

  5. Vikas Sahni

    @Shivanjali Tysm 🍁
    I wish too.

  6. Shivanjali

    Superb story bhaiya… God bless you aap dono ki mulakat jldi ho…. 👍

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