Hindi Kahaniya - Kids Stories, Timepaas Stories

Sort By: Default (Newest First) | Ratings | Comments | Most Viewed

Daachi

Share This on Twitter

काट* ‘पी सिकंदर’ के मुसलमान जाट बाक़र को अपने माल की ओर लालच भरी निगाहों से तकते देखकर चौधरी नंदू पेड़ की छाँह में बैठे-बैठे अपनी ऊंची घरघराती आवाज़ में ललकार उठा, “रे-रे अठे के करे है?*” और उसकी छह फुट लंबी सुगठित देह, जो वृक्ष के तने के साथ आराम कर रही थी, तन गई और बटन टूटे होने का कारण, मोटी खादी के कुर्ते से उसका विशाल सीना और उसकी मज़बूत बाहें दिखाई देने लगीं। बाक़र तनिक समीप आ गया। गर्द से भरी हुई छोटी-नुकीली दाढ़ी और शरअई मूँछों के ऊपर गढ़ों में धंसी हुई दो आंखों में पल भर के लिए चमक पैदा हुई और ज़रा मुस्कराकर उसने कहा – “डाची देख रहा था चौधरी, कैसी ख़ूबसूरत और जवान है, देखकर आँखों की भूख मिटती है।” अपने माल की प्रशंसा सुनकर चौधरी नंदू का तनाव कुछ कम हुआ, प्रसन्न होकर बोला, ‘किसी साँड?’ “वह, परली तरफ़ से चौथी।” बाक़र ने संकेत करते हुए कहा। ओकांह के एक घने पेड़ की छाया में आठ-दस ऊँट बँधे थे, उन्हीं में वह जवान सांडनी अपनी लंबी, सुंदर और सुडौल गर्दन बढ़ाए घने पत्तों में मुंह, मार रही थी। माल मंडी में, दूर जहां तक नज़र जाती थी बड़े-बड़े ऊंचे ऊंटों, सुंदर सांडनियों, काली-मोटी बेडौल भैंसों, सुंदर नगौरी सींगों वाले बैलों और गायों के सिवा कुछ न दिखाई देता था। गधे भी थे, पर न होने के बराबर अधिकांश तो ऊंट ही थे। बहावल नगर के मरूस्थल में होने वाली माल मंडी में उनका आधिक्य था भी स्वाभाविक। ऊंट रेगिस्तान का जानवर है। इस रेतीले इलाके में आमदरफ्त खेती- बाड़ी और बारबरादारी का काम उसी से होता है। पुराने समय में गाय दस- दस और बैल पंद्रह- पंद्रह रुपए में मिल जाते थे, तब भी अच्छा ऊंट पचास से कम में हाथ न आता था और अब भी जब इस इलाके Continue Reading…

Major Chaudary Ki Vaapsi

Share This on Twitter

किसी की टाँग टूट जाती है, तो साधारणतया उसे बधाई का पात्र नहीं माना जाता। लेकिन मेजर चौधरी जब छह सप्ताह अस्पताल में काटकर बैसाखियों के सहारे लडख़ड़ाते हुए बाहर निकले, तो बाहर निकलकर उन्होंने मिज़ाजपुर्सी के लिए आए अफसरों को बताया कि उनकी चार सप्ताह की ‘वारलीव’ के साथ उन्हें छह सप्ताह की ‘कम्पैशनेट लीव’ भी मिली है, और उसके बाद ही शायद कुछ और छुट्टी के अनंतर उन्हें सैनिक नौकरी से छुटकारा मिल जाएगा, तब सुननेवालों के मन में अवश्य ही ईष्र्या की लहर दौड़ गई थी क्योंकि मोकोक्चङ् यों सब-डिवीजन का केन्द्र क्यों न हो, वैसे वह नगा पार्वत्य जंगलों का ही एक हिस्सा था, और जोंक, दलदल, मच्छर, चूती छतें, कीचड़ फर्श, पीने को उबाला जाने पर भी गँदला पानी और खाने को पानी में भिगोकर ताजा किये गए सूखे आलू-प्याज- ये सब चीज़ें ऐसी नहीं हैं कि दूसरों के सुख-दु:ख के प्रति सहज औदार्य की भावना को जागृत करें! मैं स्वयं मोकोक्चङ् में नहीं, वहाँ से तीस मील नीचे मरियानी में रहता था, जोकि रेल की पक्की सड़क द्वारा सेवित छावनी थी। मोकोक्चङ् अपनी सामग्री और उपकरणों के लिए मरियानी पर निर्भर था इसलिए मैं जब-तब एक दिन के लिए मोकोक्चङ् जाकर वहाँ की अवस्था देख आया करता था। नाकाचारी चार-आली 2 से आगे रास्ता बहुत ही खराब है और गाड़ी कीच-काँदों में फँस-फँस जाती है, किन्तु उस प्रदेश की आवनगा जाति के हँसमुख चेहरों और साहाय्य-तत्पर व्यवहार के कारण वह जोखिम बुरी नहीं लगती। मुझे तो मरियानी लौटना था ही, मेजर चौधरी भी मेरे साथ ही चले-मरियानी से रेल-द्वारा वह गौहाटी होते हुए कलकत्ते जाएँगे और वहाँ से अपने घर पश्चिम को… स्टेशन-वैगन चलाते-चलाते मैंने पूछा, ”मेजर साहब, घर लौटते हुए कैसा लगता है?” और फिर इस डर से कि कहीं मेरा प्रश्न उन्हें कष्ट ही न दे, ”आपके एक्सिडेंट से अवश्य ही इस Continue Reading…

Padma Aur Lilly

Share This on Twitter

1) पद्मा के चन्द्र-मुख पर षोडश कला की शुभ्र चंद्रिका अम्लान खिल रही है। एकांत कुंज की कली-सी प्रणय के वासंती मलयस्पर्श से हिल उठती,विकास के लिए व्याकुल हो रही है। पद्मा की प्रतिभा की प्रशंसा सुनकर उसके पिता ऑनरेरी मैजिस्ट्रेट पंडित रामेश्वरजी शुक्ल उसके उज्ज्वल भविष्य पर अनेक प्रकार की कल्पनाएँ किया करते हैं। योग्य वर के अभाव से उसका विवाह अब तक रोक रखा है। मैट्रिक परीक्षा में पद्मा का सूबे में पहला स्थान आया था। उसे वृत्ति मिली थी। पत्नी को योग्य वर न मिलने के कारण विवाह रुका हुआ है, शुक्लजी समझा देते हैं। साल-भर से कन्या को देखकर माता भविष्य-शंका से काँप उठती हैं। पद्मा काशी विश्वविद्यालय के कला-विभाग में दूसरे साल की छात्रा है। गर्मियों की छुट्टी है, इलाहाबाद घर आई हुई है। अबके पद्मा का उभार, उसका रूप-रंग, उसकी चितवन-चलन-कौशल-वार्तालाप पहले से सभी बदल गए हैं। उसके हृदय में अपनी कल्पना से कोमल सौन्दर्य की भावना, मस्तिष्क में लोकाचार से स्वतन्त्र अपने उच्छृंखल आनुकूल्य के विचार पैदा हो गए हैं। उसे निस्संकोच चलती-फिरती, उठती-बैठती, हँसती-बोलती देखकर माता हृदय के बोलवाले तार से कुछ और ढीली तथा बेसुरी पड़ गई हैं। एक दिन सन्ध्या के डूबते सूर्य के सुनहले प्रकाश में, निरभ्र नील आकाश के नीचे, छत पर, दो कुर्सियाँ डलवा माता और कन्या गंगा का रजत-सौन्दर्य एकटक देख रही थी। माता पद्मा की पढाई, कॉलेज की छात्राओं की संख्या, बालिकाओं के होस्टल का प्रबन्ध आदि बातें पूछती हैं, पद्मा उत्तर देती है। हाथ में है हाल की निकली स्ट्रैंड मैगजीन की एक प्रति। तस्वीरें देखती जाती है। हवा का एक हल्का झोंका आया, खुले रेशमी बाल, सिर से साड़ी को उड़ाकर, गुदगुदाकर, चला गया। ”सिर ढक लिया करो, तुम बेहया हुई जाती हो।” माता ने रुखाई से कहा। पद्मा ने सिर पर साड़ी की जरीदार किनारी चढ़ा ली, आँखें नीची कर किताब के Continue Reading…

Lautnaa

Share This on Twitter

समुद्र का रंग आकाश जैसा था । वह पानी में तैर रही थी । छप्-छप्, छप्-छप् । उसे तैरना कब आया ? उसने तो तैरना कभी नहीं सीखा । फिर यह क्या जादू था ? लहरें उसे गोद में उठाए हुए थीं । एक लहर उसे दूसरी लहर की गोद में सौंप रही थी । दूसरी लहर उसे तीसरी लहर के हवाले कर रही थी । सामने, पीछे, दाएँ, बाएँ दूर तक फैला समुद्र था । समुद्र-ही समुद्र। एक अंतहीन नीला विस्तार । “सिस्टर , रोगी का ब्लड-प्रेशर चेक करो ।” पास ही कहीं से आता हुआ एक भारी स्वर । “डाक्टर, पेशेंट का ब्लड-प्रेशर बहुत ‘लो’ है ।” “सिस्टर, नब्ज़ जाँचो ।” “नब्ज़ बेहद धीमी चल रही है, सर ।” लहरें नेहा को समुद्र की अतल गहराइयों में लिए जा रही हैं । वह लहरों पर सवार हो कर नीचे जाती जा रही है । नीचे, और नीचे । वहाँ जहाँ कोई गोताखोर पहले कभी नहीं जा पाया । कमाल की बात यह है कि उसके पास कोई अॉक्सीजन -सिलिंडर नहीं है । नीचे समुद्र का तल सूरज-सा चमक रहा है । उसे अपने पास बुला रहा है । उसे आग़ोश में लेना चाह रहा है । आह ! समुद्र का जल कितना साफ़ है । कितना स्वच्छ है । कितना पारदर्शी । नर्सें और डॉक्टर आपस में बातें कर रहे हैं । “सिस्टर , क्या पेशेंट यूरिन पास कर रही है ?” एक भारी स्वर पूछ रहा है । “नहीं , डॉक्टर ।” दूसरा मुलायम स्वर जवाब दे रहा है । पानी में बुलबुले उठ रहे हैं । नेहा बुलबुलों के जाल में क़ैद होती जा रही है । बुलबुलों के भीतर आवाज़ें बंद हैं, जो उनके फूटते ही फैलती जा रही हैं । रोगी के चारो ओर डॉक्टरों और नर्सों की टोली जमा है । उसकी पलकें Continue Reading…

Ganeshi Ki Katha

Share This on Twitter

कहानी की शुरुआत कैसे की जानी चाहिए ? मैं इस कहानी की शुरुआत ‘वंस अपान अ टाइम, देयर लिव्ड अ पर्सन नेम्ड गनेशी’ वाले अंदाज़ में कर सकता हूँ । या मैं कहानी की शुरुआत तिरछे अक्षरों ( इटैलिक्स ) में लिखे कुछ धमाकेदार वाक्यों से कर सकता हूँ । मसलन — “नींद और जागने की सीमा-रेखा पर स्थित है यह कहानी । अंत और शुरुआत के बीच की संधि है यह कहानी । ढलती हुई शाम और रात के बीच एक ऐसा समय आता है जब धरती कुछ कहना चाहती है , आकाश कुछ सुनना चाहता है । वही कथन है गनेशी की यह कहानी ।” या मैं कहानी के शुरू में ही नींद और सपनों का ‘हेडी कॉकटेल’ बना कर पाठकों को पिला सकता हूँ जिसे पीते ही पाठक नशे में आ जाएँ । मसलन — “कुछ कहानियाँ कहानियाँ नहीं होतीं । अधमिटे अक्षर होते हैं । अस्फुट ध्वनियाँ होती हैं । गनेशी गहरी नींद में कोई सपना देख रहा होता । सपने में एक आदिम जंगल है । हवा में सड़ रहे पत्तों की गंध है । दूर कहीं एक नारी स्वर कोई भूला हुआ गीत गा रहा है । अरे, यह आवाज़ तो उसकी पत्नी की है । बदहवास-सा गनेशी उस आवाज़ का पीछा करता है । उसे एक खंडहर नज़र आता है । उसमें पीली रोशनी है । किंतु जैसे ही गनेशी वहाँ पहुँचता है , अचानक वह रोशनी बुझ जाती है । गीत बंद हो जाता है । भुतहा अँधेरे के अथाह समुद्र में गनेशी किसी थके हुए डूबते तैराक-सा हाथ-पैर मारने लगता है । अचानक उसकी नींद टूट जाती है । या शायद पहले वाली बात कल्पना में सोची गई थी । अब वह नींद में है । उसके चारो ओर काली धुँध है । धुँध के उस पार उसकी पत्नी हँस रही Continue Reading…

Raspriya

Share This on Twitter

धूल में पड़े कीमती पत्थर को देख कर जौहरी की आँखों में एक नई झलक झिलमिला गई – अपरूप-रूप! चरवाहा मोहना छौंड़ा को देखते ही पँचकौड़ी मिरदंगिया की मुँह से निकल पड़ा – अपरुप-रुप! …खेतों, मैदानों, बाग-बगीचों और गाय-बैलों के बीच चरवाहा मोहना की सुंदरता! मिरदंगिया की क्षीण-ज्योति आँखें सजल हो गईं। मोहना ने मुस्करा कर पूछा, ‘तुम्हारी उँगली तो रसपिरिया बजाते टेढ़ी हो गई है, है न?’ ‘ऐ!’ – बूढ़े मिरदंगिया ने चौंकते हुए कहा, ‘रसपिरिया? …हाँ …नहीं। तुमने कैसे …तुमने कहाँ सुना बे…?’ ‘बेटा’ कहते-कहते रुक गया। …परमानपुर में उस बार एक ब्राह्मण के लड़के को उसने प्यार से ‘बेटा’ कह दिया था। सारे गाँव के लड़कों ने उसे घेर कर मारपीट की तैयारी की थी – ‘बहरदार होकर ब्राह्मण के बच्चे को बेटा कहेगा? मारो साले बुड्ढे को घेर कर! …मृदंग फोड़ दो।’ मिरदंगिया ने हँस कर कहा था, ‘अच्छा, इस बार माफ कर दो सरकार! अब से आप लोगों को बाप ही कहूँगा!’ बच्चे खुश हो गये थे। एक दो-ढाई साल के नंगे बालक की ठुड्‌डी पकड़ कर वह बोला था, ‘क्यों, ठीक है न बाप जी?’ बच्चे ठठा कर हँस पड़े थे। लेकिन, इस घटना के बाद फिर कभी उसने किसी बच्चे को बेटा कहने की हिम्मत नहीं की थी। मोहना को देख कर बार-बार बेटा कहने की इच्छा होती है। ‘रसपिरिया की बात किसने बताई तुमसे? …बोलो बेटा!’ दस-बारह साल का मोहना भी जानता है, पँचकौड़ी अधपगला है। …कौन इससे पार पाए! उसने दूर मैदान में चरते हुए अपने बैलों की ओर देखा। मिरदंगिया कमलपुर के बाबू लोगों के यहाँ जा रहा था। कमलपुर के नंदूबाबू के घराने में भी मिरदंगिया को चार मीठी बातें सुनने को मिल जाती हैं। एक-दो जून भोजन तो बँधा हुआ ही है, कभी-कभी रसचरचा भी यहीं आ कर सुनता है वह। दो साल के बाद वह इस इलाके Continue Reading…

Tobba Tek Singh

Share This on Twitter

बंटवारे के दो-तीन साल बाद पाकिस्तान और हिंदुस्तान की हुकूमतों को ख्याल आया कि अख्लाकी कैदियों की तरह पागलों का भी तबादला होना चाहिए, यानी जो मुसलमान पागल हिन्दुस्तान के पागलखानों में हैं उन्हें पाकिस्तान पहुंचा दिया जाय और जो हिन्दू और सिख पाकिस्तान के पागलखानों में है उन्हें हिन्दुस्तान के हवाले कर दिया जाय। मालूम नहीं यह बात माकूल थी या गैर-माकूल थी। बहरहाल, दानिशमंदों के फैसले के मुताबिक इधर-उधर ऊँची सतह की कांफ्रेंसें हुई और दिन आखिर एक दिन पागलों के तबादले के लिए मुकर्रर हो गया। अच्छी तरह छान बीन की गयी। वो मुसलमान पागल जिनके लवाहिकीन (सम्बन्धी ) हिन्दुस्तान ही में थे वहीं रहने दिये गये थे। बाकी जो थे उनको सरहद पर रवाना कर दिया गया। यहां पाकिस्तान में चूंकि करीब-करीब तमाम हिन्दु सिख जा चुके थे इसलिए किसी को रखने-रखाने का सवाल ही न पैदा हुआ। जितने हिन्दू-सिख पागल थे सबके सब पुलिस की हिफाजत में सरहद पर पहुंचा दिये गये। उधर का मालूम नहीं। लेकिन इधर लाहौर के पागलखानों में जब इस तबादले की खबर पहुंची तो बड़ी दिलचस्प चीमेगोइयां होने लगी। एक मुसलमान पागल जो बारह बरस से हर रोज बाकायदगी के साथ जमींदार पढ़ता था, उससे जब उसके एक दोस्त ने पूछा- – मोल्हीसाब। ये पाकिस्तान क्या होता है ? तो उसने बड़े गौरो फिक्र के बाद जवाब दिया- – हिन्दुस्तान में एक ऐसी जगह है जहां उस्तरे बनते हैं। ये जवाब सुनकर उसका दोस्त मुतमइन हो गया। इसी तरह एक और सिख पागल ने एक दूसरे सिख पागल से पूछा– – सरदार जी हमें हिन्दुस्तान क्यों भेजा जा रहा है – हमें तो वहां की बोली नहीं आती। दूसरा मुस्कराया- – मुझे तो हिन्दुस्तान की बोली आती है – हिंदुस्तानी बड़े शैतानी आकड़ -आकड़ फिरते हैं। एक मुसलमान पागल ने नहाते-नहाते ‘पाकिस्तान जिन्दाबाद’ का नारा इस जोर से बुलन्द किया Continue Reading…

Like us!