Hindi Kahaniya - Kids Stories, Timepaas Stories

Holi

Share This on Twitter
"कल होली है।" "होगी।" "क्या तुम न मनाओगी?" "नहीं।" ''नहीं?'' ''न ।'' '''क्यों? '' ''क्या बताऊं क्यों?'' ''आखिर कुछ सुनूं भी तो ।'' ''सुनकर क्या करोगे? '' ''जो करते बनेगा ।'' ''तुमसे कुछ भी न बनेगा ।'' ''तो भी ।'' ''तो भी क्या कहूँ? "क्या तुम नहीं जानते होली या कोई भी त्योहार वही मनाता है जो सुखी है । जिसके जीवन में किसी प्रकार का सुख ही नहीं, वह त्योहार भला किस बिरते पर मनावे? '' ''तो क्या तुमसे होली खेलने न आऊं? '' ''क्या करोगे आकर?'' सकरुण दृष्टि से करुणा की ओर देखते हुए नरेश साइकिल उठाकर घर चल दिया । करुणा अपने घर के काम-काज में लग गई । (2) नरेश के जाने के आध घंटे बाद ही करुणा के पति जगत प्रसाद ने घर में प्रवेश किया । उनकी आँखें लाल थीं । मुंह से तेज शराब की बू आ रही थी । जलती हुई सिगरेट… Continue Reading

Hum Log

Share This on Twitter
"बिमल, सोचता हूँ मैं वापस चला जाऊं'', प्रोफेसर महेश कुमार ने निराशा भरे स्वर में कहा । मुझे उसके इस सुझाव का कारण पता था । फिर भी जान-बूझकर मैंने प्रश्न किया - "क्यों?" ''कल सूवा में गड़बड़ी हुई है । नैन्दी से कुछ आतंकवादियों ने एयर न्यूज़ीलैंड के विमान को हाइजैक करने की कोशिश की है । अगले सप्ताह तक पता नहीं यहाँ क्या कुछ न हो जाए ।'' "हालात सुधर भी तो सकते हैं, प्रोफेसर साहब ।'' ''मैं जानता हूँ कि आप मुझसे जाने के लिये नहीं कहेंगे, क्योंकि मैं आप का मेहमान हूँ । कोई भी शिष्ट व्यक्ति अपने मेहमान से ऐसा नहीं कहेगा, पर मैं भली-भाँति समझ सकता हूँ कि आपको मेरी चिन्ता है । मैं परदेसी हूँ । इस तरह की राजनीतिक उथल-पुथल के समय वर्तमान सरकार मुझे पकड़ भी सकती है ।'' ''वह कैसे? आप ने कौन-सा अपराध किया है?'' ''भारत सरकार का खुफिया… Continue Reading

Weh Chaar

Share This on Twitter
रेलगाड़ी के इस डिब्बे में वे चार हैं, जबकि मैं अकेला । वे हट्टे-कट्टे हैं , जबकि मैं कमज़ोर-सा । वे लम्बे-तगड़े हैं, जबकि मैं औसत क़द-काठी का । जल्दबाज़ी में शायद मैं ग़लत डिब्बे में चढ़ गया हूँ । मुझे इस समय यहाँ इन लोगों के बीच नहीं होना चाहिए -- मेरे भीतर कहीं कोई मुझे चेतावनी दे रहा है । देश के कई हिस्सों में दंगे हो रहे हैं । हालाँकि हमारा इलाक़ा अभी इससे अछूता है पर कौन जाने कब कहाँ क्या हो जाए । अगले एक घंटे तक मुझे इनसे सावधान रहना होगा । तब तक जब तक मेरा स्टेशन नहीं आ जाता । मैं चोर-निगाहों से उन चारों की तरफ़ देखता हूँ । दो की लम्बी दाढ़ी है । चारों ने हरा कुर्ता- पायजामा और जाली वाली सफ़ेद टोपी पहन रखी है । वे चारों मुझे घूर क्यों रहे हैं? कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं?… Continue Reading

Khel

Share This on Twitter
मौन-मुग्ध संध्या स्मित प्रकाश से हँस रही थी। उस समय गंगा के निर्जन बालुकास्थल पर एक बालक और बालिका सारे विश्व को भूल, गंगा-तट के बालू और पानी से खिलवाड़ कर रहे थे। बालक कहीं से एक लकड़ी लाकर तट के जल को उछाल रहा था। बालिका अपने पैर पर रेत जमाकर और थोप-थोपकर एक भाड़ बना रही थी। बनाते-बनाते बालिका भाड़ से बोली- "देख ठीक नहीं बना, तो मैं तुझे फोड़ दूंगी।" फिर बड़े प्यार से थपका-थपकाकर उसे ठीक करने लगी। सोचती जाती थी- "इसके ऊपर मैं एक कुटी बनाउंगी, वह मेरी कुटी होगी। और मनोहर...? नहीं, वह कुटी में नहीं रहेगा, बाहर खड़ा-खड़ा भाड़ में पत्ते झोंकेगा। जब वह हार जाएगा, बहुत कहेगा, तब मैं उसे अपनी कुटी के भीतर ले लूंगी। मनोहर उधर पानी से हिल-मिलकर खेल रहा था। उसे क्या मालूम कि यहाँ अकारण ही उस पर रोष और अनुग्रह किया जा रहा है। बालिका सोच… Continue Reading

Deputy Collectory

Share This on Twitter
शकलदीप बाबू कहीं एक घंटे बाद वापस लौटे। घर में प्रवेश करने के पूर्व उन्होंने ओसारे के कमरे में झाँका, कोई भी मुवक्किल नहीं था और मुहर्रिर साहब भी गायब थे। वह भीतर चले गए और अपने कमरे के सामने ओसारे में खड़े होकर बंदर की भाँति आँखे मलका-मलकाकर उन्होंने रसोईघर की ओर देखा। उनकी पत्नी जमुना, चौके के पास पीढ़े पर बैठी होंठ-पर-होंठ दबाए मुँह फुलाए तरकारी काट रही थी। वह मंद-मंद मुस्कराते हुए अपनी पत्नी के पास चले गए। उनके मुख पर असाधारण संतोष, विश्वास एवं उत्साह का भाव अंकित था। एक घंटे पूर्व ऐसी बात नही थी। बात इस प्रकार आरंभ हुई। शकलदीप बाबू सबेरे दातौन-कुल्ला करने के बाद अपने कमरे में बैठे ही थे कि जमुना ने एक तश्तरी में दो जलेबियाँ नाश्ते के लिए सामने रख दीं। वह बिना कुछ बोले जलपान करने लगे। जमुना पहले तो एक-आध मिनट चुप रही। फिर पति के मुख… Continue Reading

Amritsar Aa Gya

Share This on Twitter
गाड़ी के डिब्बे में बहुत मुसाफिर नहीं थे। मेरे सामनेवाली सीट पर बैठे सरदार जी देर से मुझे लाम के किस्से सुनाते रहे थे। वह लाम के दिनों में बर्मा की लड़ाई में भाग ले चुके थे और बात-बात पर खी-खी करके हँसते और गोरे फौजियों की खिल्ली उड़ाते रहे थे। डिब्बे में तीन पठान व्यापारी भी थे, उनमें से एक हरे रंग की पोशाक पहने ऊपरवाली बर्थ पर लेटा हुआ था। वह आदमी बड़ा हँसमुख था और बड़ी देर से मेरे साथवाली सीट पर बैठे एक दुबले-से बाबू के साथ उसका मजाक चल रहा था। वह दुबला बाबू पेशावर का रहनेवाला जान पड़ता था क्योंकि किसी-किसी वक्त वे आपस में पश्तो में बातें करने लगते थे। मेरे सामने दाईं ओर कोने में, एक बुढ़िया मुँह-सिर ढाँपे बैठा थी और देर से माला जप रही थी। यही कुछ लोग रहे होंगे। संभव है दो-एक और मुसाफिर भी रहे हों, पर… Continue Reading

Hingwala

Share This on Twitter
लगभग 35 साल का एक खान आंगन में आकर रुक गया । हमेशा की तरह उसकी आवाज सुनाई दी - ''अम्मा... हींग लोगी?'' पीठ पर बँधे हुए पीपे को खोलकर उसने, नीचे रख दिया और मौलसिरी के नीचे बने हुए चबूतरे पर बैठ गया । भीतर बरामदे से नौ - दस वर्ष के एक बालक ने बाहर निकलकर उत्तर दिया - ''अभी कुछ नहीं लेना है, जाओ !" पर खान भला क्यों जाने लगा ? जरा आराम से बैठ गया और अपने साफे के छोर से हवा करता हुआ बोला- ''अम्मा, हींग ले लो, अम्मां ! हम अपने देश जाता हैं, बहुत दिनों में लौटेगा ।" सावित्री रसोईघर से हाथ धोकर बाहर आई और बोली - ''हींग तो बहुत-सी ले रखी है खान ! अभी पंद्रह दिन हुए नहीं, तुमसे ही तो ली थी ।" वह उसी स्वर में फिर बोला-''हेरा हींग है मां, हमको तुम्हारे हाथ की बोहनी लगती… Continue Reading

Like us!